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बैकफुट पर हिट एंड रन कानून, ट्रक हड़तालियों के आगे क्यों झुकी सरकार?

By DAYANAND MOHITE | published: जनवरी 03, 2024 08:14 PM 2019-02-12T14:15:30+5:30

बैकफुट पर हिट एंड रन कानून, ट्रक हड़तालियों के आगे क्यों झुकी सरकार?

शहर : राष्ट्रीय

इस सत्र में बिना किसी बहस के उन्हीं संशोधनों के आधार पर बिल पास करवा लिए गए. राष्ट्रपति के दस्तख़त के बाद ये प्रस्ताव क़ानून बन गए. परंतु जब ट्रक ऑपरेटर्स की हड़ताल से चक्का जाम हुआ तब सरकार को इससे दो-चार होना पड़ा और क़ानून पर अमल रुक गया. इस तरह सरकार फिर से हड़तालियों के आगे झुकी है.

केंद्र सरकार एक और मामले में फिर झुक गई. हिट एंड रन को लेकर बनाये गये नये कानून पर अमल को उसने रोक दिया है. संसद में जो सरकार इतनी शक्तिशाली है कि कोई भी कानून वह बिना किसी विरोध के पास करा सकती है, उसका बार-बार झुकना शोभा नहीं देता. कृषि कानूनों की वापसी, पहलवानों के विरोध के चलते कुश्ती महासंघ को सस्पेंड करना और उसके बाद अब ट्रक ऑपरेटर्स की हड़ताल से झुक जाना क्या साबित करता है! यही ना कि सरकार सख़्त क्यों नहीं होती?

सरकार को या तो पहले से ही सोच-समझ कर कोई कानून बनाना चाहिये या फिर जो कानून बना दिया, उस पर डटे रहना चाहिये. सच यह भी है कि किसी को राह चलते कुचल कर भाग जाने के मामले बहुत अधिक होते हैं. अधिकतर मामलों में ड्राइवर की लापरवाही होती है. किंतु सरकार उनके विरोध को झेल नहीं पायी.

बार-बार झुकने से सरकार का इक़बाल कम होता है

हिट एंड रन मामलों पर नियंत्रण पाने के लिए सजा और जुर्माने की राशि बढ़ाई गई थी, ताकि ड्राइवरों की लापरवाही पर अंकुश पाया जा सके. किंतु ड्राइवरों, खासकर ट्रक ऑपरेटर्स का दबाव इतना अधिक पड़ा कि सरकार को अपने ही फ़ैसले से मुकरना पड़ा. दुनिया में सभी जगह सरकारें जो कानून बनती हैं, उन पर अमल जरूरी होता है. मगर भारत में हर कानून को तोड़ने में ही लोगों को आनंद आता है. अगर कानून का भय ही किसी में नहीं रहा, तो सरकार का इक़बाल भी ख़त्म होने लगता है.

सरकारें होती ही इसीलिए हैं कि वे पब्लिक को क़ानून पर अमल करने को प्रेरित करें. लेकिन यदि सरकारें इस तरह के दबाव के आगे झुकती रहीं तो हर क़ानून का उल्लंघन करने वाले बढ़ते ही जाएँगे. सड़क पर चलने के कुछ नियम-क़ायदे होने ही चाहिए और इसके लिए उन पर सख़्ती से अमल जरूरी है.

विकसित देशों में सड़क क़ानून सख़्त हैं

किसी भी विकसित और सभ्य देश में सड़क पर चलने के नियम काफ़ी सख़्त हैं. अमेरिका, कनाडा और योरोप में लेन पर चलना आवश्यक होता है और अगर ड्राइवर ने इसका उल्लंघन किया तो उसे भारी-भरकम जुर्माना अदा करना पड़ेगा. और यदि दोबारा नियम तोड़ा तो लाइसेन्स रद्द. यूं वहां पर ड्राइविंग लाइसेन्स पाना बहुत मुश्किल होता है. और यदि मिल गया तो एक बार भी नियम तोड़ दिया तो भविष्य में गाड़ी नहीं चला सकेंगे. लेकिन वहां यह नियम क़ानून दुपहिया वाहनों पर भी है.

भारत में तो दुपहिया वाहन सड़क पर स्टंटबाजी करते हुए चलते हैं. ऐसे में किसी भी बड़ी गाड़ी के लपेटे में जाना सामान्य बात है. किंतु यदि वह मारा गया तो फौरन कहा जाएगा कि कार या ट्रक का ड्राइवर लापरवाही से गाड़ी चला रहा था. लोग उस पर टूट पड़ेंगे. इस भय से उसे भागना पड़ेगा.

सारे पहलुओं पर गौर करना जरूरी था

बेहतर रहता कि सरकार सारे पहलुओं पर गौर करती और तब कोई फैसला लेती. उसने अचानक पुराने सारे कानून बदले और IPC (Indian Penal code) की जगह BNS (भारतीय न्याय संहिता) बना दी. हिट एंड रन (टक्कर मार कर भाग जाना) को सरकार ने गम्भीर अपराध माना. नई दंड संहिता BNS की धारा 104 (1) और 104 (2) के तहत परिभाषित किया कि यदि वाहन चालक किसी को कुचल कर भाग जाता है तो उसे दस वर्ष की कैद या 7 लाख रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा.

एक ड्राइवर के लिए 7 लाख बहुत बड़ी राशि है और 10 वर्ष तक जेल में सड़ने का अर्थ है, उसके परिवार तबाह हो जाना. जबकि हो सकता है, कि दुर्घटना उसकी वजह से हुई हो. जब तक कोई पुख़्ता सबूत हों तब तक भला ड्राइवर अपराधी कैसे हो गया? सरकार ने क़ानून की इन अड़चनों पर गौर किया लोगों से मिल-बैठ कर बात की.

विपक्ष शून्य संसद में यही होता है

दरअसल सरकार को भी अपने प्रस्ताव पास करने की इतनी हड़बड़ी होती है कि उसे लगता है, किसी भी तरह लोकसभा और राज्यसभा में उसके बिल पास हो जाएं. जब ये कानून पास हुए तब संसद लगभग विपक्ष-शून्य थी. ऐसी स्थिति में पहले की संसदीय समिति ने जो संशोधन किए थे, उसी के आधार पर बिल पास करवा लिया गया. मालूम हो कि पिछले सत्र में भी IPC और CrPC तथा IEA में बदलाव का प्रस्ताव सरकार लाई थी तब कई सदस्यों ने इनमें संशोधन की माँग की थी. इसलिए प्रस्ताव एक संसदीय कमेटी को भेजा गया.

तीसरी बार झुकी सरकार

यह तीसरी बार हुआ है, जब जन-दबाव के आगे सरकार को झुकना पड़ा है. पहली बार मोदी-2 राज में आए किसान बिलों पर सरकार किसानों के दबाव में झुकी. दूसरी बार साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया जैसे पहलवानों ने सरकार को झुका लिया और सरकार ने WFI की चुनी हुई बॉडी को सस्पेंड कर दिया. और अब धारा 104 (1) तथा 104 (2) के अमल पर रोक लगा दी. गृह सचिव अजय भल्ला ने मोटर ऑपरेटर्स यूनियन को भरोसा दिया है कि अगली बातचीत तक हिट एंड रन मामलों में ये धाराएं लागू नहीं होंगी.

इसके पहले हिट एंड रन के केस में आईपीसी की धारा 279, 304 और 338 के तहत मामला दर्ज किया जाता था. अगर कोई लापरवाही से वाहन चलाता था तो उस पर धारा 279 का उल्लंघन करने का आरोप लगाया जा सकता था. इन धाराओं के तहत ड्राइवर जल्द ही ज़मानत पर बाहर जाया करता था. तब सजा भी बहुत कम हुआ करती थी.

हाई वे पर गाड़ी चलाने के कोई नियम नहीं

सरकार हाई वे, एक्सप्रेस वे बनवा तो रही है लेकिन उन पर गाड़ी चलाने के नियम-क़ायदे समझाने की कोई व्यवस्था नहीं है. ही कोहरे या बर्फ़वारी को हटाने के कोई इंतज़ाम हैं. हर हाई वे पर ट्रैक्टर ले कर किसान घुस आते हैं और किसी भी इंट्रेंस या एग्ज़िट से बाइकर्स जाते हैं. ये रॉंग साइड भी चलते हैं और ओवर टेक लेन से हटते नहीं हैं. ऐसी स्थिति में स्पीड से रही किसी कार को अचानक रोकना संभव नहीं हैं. नतीजा होता है एक्सीडेंट.

अगर एक्सीडेंट में बाइकर्स मारा गया तो पास के गांव वाले दुर्घटना वाले वाहन चालक को पकड़ कर मार देंगे इसलिए उसे वहाँ से भागना पड़ता है. हाई वे पर हर जगह कैमरे लगाये जाने भी संभव नहीं हैं, इसलिए बाइकर्स के इन सड़कों पर रोक के कड़े इंतज़ाम होने चाहिए.

सबसे आसान है DL बनवाना

भारत में ड्राइविंग लाइसेन्स बनवाना बहुत आसान है. परिवहन विभाग के दलाल बिना किसी की ड्राइविंग क्षमता को जाने-बूझे लाइसेन्स बनवा देते हैं. लिखित परीक्षा और उसकी ड्राइविंग क्षमता को जाँचने के नियम सिर्फ़ काग़ज़ों पर हाई बने हैं. सच यह है कि दलाल बिना किसी दक्षता को परखे आज भी ड्राइविंग लाइसेन्स बनवा देते हैं. सड़कों पर अपने बच्चों से कार ड्राइव करवाना लोग अपनी शान समझते हैं. नाबालिग बच्चे बाइक चलाते हैं और स्टंट भी करते हैं.

अक्सर वे बाइक लहराते हुए चलते हैं ऐसी स्थिति में वे यदि किसी बड़े वाहन की चपेट में गए तो उनका मारा जाना निश्चित है. ऐसे में सिर्फ़ ड्राइवर को सजा देना कहाँ का न्याय हुआ? लेकिन जब सरकार हड़बड़ी में कानून बनाएगी तब ऐसी चूक होंगी ही.

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